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Monday 8 September, 2008
 20:11 | 6/Jun/2008 |  5 Comment(s)
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Satya jeetta hai

भूमण्डलीकरण के आगमन के बाद भौतिकता की दौड़ शुरू हो गयी है और इस दौड़ में हर कोई उचक कार् हू सब कुच्छ हासिल कार लेना चाहता है, जो एक भौतिकवादी संसार में आवश्यक है. लेकिन इस दौड़ में अगर कुछ बाधक है तो वो अंतरात्मा है. इसीलिए आदमी अंतरात्मा को गिरवी रखने पर आमादा है.ईसी अंतरात्मा को “सत्य जीतता है” काव्य संग्रह में मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने झकझोरने का प्रयास किया है. प्रयाग के मूल निवासी और पेशे से अभियंता मुरली मनोहर श्रीवास्तव ने अपने ताज़ा काव्य ग़ज़ल संग्रह “सत्य जीतता है” में जीवन के अनेक पहलुओं पर कलम चलाई है जिसमें उनका प्रेरणास्रोत किसी एक नायिका के इर्द गिर्द नहीं घूमता है. उनकी चिंता है की आदमी का हृदय मशीन हो गया है जो हर सही गलत बात पर बस ऊपर नीचे सर हिलाता है. मुरली मनोहर श्रीवास्तव की दृष्टि में शून्य मात्र ख़ालीपन नहीं है बल्कि शून्य एक उपलब्धि है चूंकि कभी कभी शून्य से ख़ालीपन भरा जाता है. भगवान को भी वो चुनौती देने से हिचकते नहीं हैं क़ी भगवान बनना तो आसान है लेकिन इंसान बनना बहुत मुश्किल.
लेखक और प्रकाशक के संबंधों पर भी मुरली बाबू वॉर करने से चोक नहीं हैन.ऊन्की पीड़ा है की एक रचना को लेखक हृदय में धीरे धीरे सेता है, असीम पीड़ा के साथ जाम देता है और सरस्वती के पुत्रा की यह रचना जब प्रकाशनार्थ लुक्शमीपुत्रा प्रकाशक के पास पहुँचती है तो हू रचना के साथ बलात्कार कार कूड़े की टोकरी में फेंक देता है.
संग्रह की भूमिका जाने माने कवि अशोक चक्रधर ने लिखी है.शन्ग्रह में 48 कविताएँ हैं और 6 ग़ज़लें हैं. परंतु मुरली बाबू ग़ज़लों के साथ न्याय नहीं कार पाए हैं या बेलाग कहें तो ग़ज़ल की टांग उन्होने ज़बरदस्ती मरोदी है चूंकि यहाँ भाषागत वा व्याकरणीय अशुद्धियाँ हैं. बेहतर होता की मुरली बाबू कविता में ही हाथ आजमाते चूंकि ज्यादा लिखना जरूरी नहीं है परंतु अच्च्हा लिखना जरूरी है.बहर्हल कुलमिलाकर काव्या संग्रह औसत दर्ज़े से कुच्छ बेहतर है ‘थीम’ के कारण. अगर अशोक चक्रधर के शब्दों में कहें तो-“ इन कविताओं को पढ़िए नहीं इनसे मिलिए.”

पुस्तक:-- सत्या जीतता है
लेखक:-- मुरली मनोहर श्रीवास्तावा
मूल्या:--80 र्स.
पृष्ठ:--72
प्रकाशक:-- साहित्या वीथी, डेल्ही.

रिव्यू बाइ

अमलेन्दु उपाध्याय

Category: Books | Permalink